नींद सिर्फ दिनभर की थकान दूर करने का माध्यम नहीं है, बल्कि शरीर और मस्तिष्क को दोबारा व्यवस्थित करने की एक जरूरी जैविक प्रक्रिया है। महिलाओं की नींद की जरूरत उसकी उम्र, स्वास्थ्य, दिनचर्या और जीवनशैली के अनुसार अलग हो सकती है। लेकिन महिलाओं की नींद को प्रभावित करने वाले कुछ अतिरिक्त जैविक और सामाजिक कारण भी सामने आते हैं।
हार्मोनल बदलाव, मासिक चक्र, गर्भावस्था, मातृत्व, घरेलू और पेशेवर जिम्मेदारियां तथा मानसिक दबाव महिलाओं की नींद के समय और उसकी गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि कई महिलाएं पर्याप्त समय बिस्तर पर बिताने के बावजूद सुबह पूरी तरह तरोताजा महसूस नहीं कर पातीं।
नींद को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में निश्चित रूप से कितने मिनट अधिक सोना चाहिए, इसका कोई सार्वभौमिक वैज्ञानिक नियम नहीं है। कुछ शोधों में महिलाओं की औसत नींद पुरुषों से थोड़ी अधिक पाई गई है, लेकिन विशेषज्ञ आमतौर पर नींद की अवधि से ज्यादा उसकी गुणवत्ता और व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पर जोर देते हैं।
क्या महिलाओं को सचमुच पुरुषों से ज्यादा नींद चाहिए?
कुछ अध्ययनों में महिलाओं की औसत नींद पुरुषों की तुलना में थोड़ी अधिक दर्ज की गई है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर महिला को पुरुष की तुलना में तय संख्या में अतिरिक्त मिनट सोना चाहिए।
वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सात से नौ घंटे की नींद की सलाह दी जाती है। लेकिन किसी व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकता उसकी उम्र, शारीरिक गतिविधि, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार बदल सकती है।
महिलाओं में कई ऐसे जैविक चरण होते हैं, जिनके दौरान नींद की जरूरत और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। मासिक धर्म चक्र से लेकर गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति तक हार्मोन में होने वाले बदलाव नींद के अनुभव को बदल सकते हैं।
मासिक चक्र और हार्मोन कैसे बदलते हैं नींद?
महिलाओं की नींद को समझने में मासिक चक्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चक्र के अलग-अलग चरणों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का स्तर बदलता रहता है।
चक्र के पहले हिस्से को फॉलिक्युलर चरण कहा जाता है। इस दौरान एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ता है। कुछ महिलाओं में इस चरण के दौरान नींद अपेक्षाकृत बेहतर महसूस हो सकती है।
इसके बाद ल्यूटियल चरण आता है, जिसमें प्रोजेस्टेरोन का स्तर बढ़ता है। इस दौरान शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ सकता है और कुछ महिलाओं को उनींदापन, बेचैनी या रात में नींद टूटने जैसी परेशानियों का अनुभव हो सकता है।
मासिक धर्म से ठीक पहले कई महिलाओं में नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पेट में दर्द, मूड में बदलाव, सिरदर्द और अन्य शारीरिक लक्षण भी आराम की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
जब नींद का दुश्मन बन जाता है मानसिक श्रम
महिलाओं की नींद पर केवल जैविक बदलाव ही असर नहीं डालते। रोजमर्रा की जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पेशेवर काम के साथ घर संभालना, भोजन की तैयारी, सफाई, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा परिवार से जुड़ी योजनाएं कई महिलाओं की दिनचर्या का हिस्सा होती हैं। इन जिम्मेदारियों के साथ जुड़ा मानसिक दबाव भी आराम के समय को प्रभावित कर सकता है।
कई बार शरीर बिस्तर पर पहुंच जाता है, लेकिन दिमाग अगले दिन के कामों की सूची में उलझा रहता है। ऐसी स्थिति में पर्याप्त घंटे सोने के बावजूद नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसी संदर्भ में ‘स्लीप डेब्ट’ यानी नींद का कर्ज महत्वपूर्ण अवधारणा है। जब किसी व्यक्ति को लगातार अपनी जरूरत से कम नींद मिलती है, तो समय के साथ थकान और दिन में सुस्ती बढ़ सकती है।
शिफ्ट वर्क और अनियमित दिनचर्या का असर
हर महिला की दिनचर्या एक जैसी नहीं होती। स्वास्थ्य सेवा, मीडिया, परिवहन, आतिथ्य और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को कई बार रात या अनियमित समय में काम करना पड़ता है।
ऐसी परिस्थितियों में शरीर की जैविक घड़ी और काम के समय के बीच तालमेल बिगड़ सकता है। रात में काम करने और दिन में सोने की मजबूरी नींद की अवधि के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अनियमित काम के समय से जूझ रहे लोगों के लिए नियमित नींद का कार्यक्रम बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में काम के बाद पर्याप्त शांत और अंधेरा वातावरण उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
सिर्फ ज्यादा घंटे नहीं, अच्छी नींद भी जरूरी
नींद की बात केवल घंटों की संख्या तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नींद कई चरणों में होती है और हर चरण शरीर तथा मस्तिष्क के लिए अलग भूमिका निभाता है।
एन-आरईएम नींद के गहरे चरणों में शरीर की मरम्मत और पुनर्बहाली से जुड़ी प्रक्रियाएं सक्रिय रहती हैं। वहीं आरईएम नींद सीखने, याददाश्त और भावनात्मक प्रसंस्करण से जुड़ी मानी जाती है। महिलाओं में हार्मोनल बदलाव इन नींद चरणों की संरचना को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, मासिक चक्र के अलग-अलग चरणों में नींद की निरंतरता और शरीर के तापमान में बदलाव महसूस हो सकता है।
इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई महिला आठ घंटे बिस्तर पर रही या नहीं। यह भी महत्वपूर्ण है कि उसकी नींद कितनी लगातार, आरामदायक और पुनर्बहाली वाली थी।
गर्भावस्था और मातृत्व में बदल जाती है नींद की जरूरत
महिलाओं के जीवन में गर्भावस्था और मातृत्व ऐसे चरण हैं, जहां नींद का पैटर्न काफी बदल सकता है। गर्भावस्था के दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल और शारीरिक बदलावों के कारण थकान बढ़ सकती है।
बाद के चरणों में पेट का आकार, बार-बार पेशाब की जरूरत, शारीरिक असुविधा और अन्य बदलाव रात की नींद को प्रभावित कर सकते हैं।
बच्चे के जन्म के बाद स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। नवजात शिशु की जरूरतों के कारण रात में बार-बार जागना पड़ सकता है। इस दौरान लगातार कई घंटों की नींद मिलना कठिन हो जाता है और नींद का कर्ज बढ़ सकता है।
यही वजह है कि मातृत्व के दौरान परिवार का सहयोग केवल घरेलू काम बांटने तक सीमित नहीं होना चाहिए। महिला को नियमित आराम और पर्याप्त नींद का अवसर मिलना भी उतना ही जरूरी है।
क्या 8 से 9 घंटे की नींद हर महिला के लिए जरूरी है?
हर महिला के लिए आठ या नौ घंटे की नींद अनिवार्य नहीं कही जा सकती। नींद की जरूरत व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होती है। कुछ लोगों को सात से आठ घंटे की नींद के बाद पर्याप्त आराम महसूस हो सकता है, जबकि कुछ को अधिक नींद की आवश्यकता हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि सुबह उठने के बाद व्यक्ति कैसा महसूस करता है और दिन के दौरान उसकी ऊर्जा तथा एकाग्रता कैसी रहती है।
यदि कोई महिला लगातार थकान, दिन में अत्यधिक नींद, बार-बार नींद टूटने, खर्राटों या नींद में सांस रुकने जैसी समस्या महसूस करती है, तो इसे केवल व्यस्त जीवनशैली का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
महिलाओं की नींद को प्राथमिकता देने की जरूरत
नींद को लेकर सबसे जरूरी संदेश यह है कि पर्याप्त आराम आलस्य नहीं है। अच्छी नींद शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, एकाग्रता और रोजमर्रा की कार्यक्षमता से जुड़ी है।
महिलाओं के मामले में जैविक बदलावों के साथ-साथ काम और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियां भी नींद को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए समाधान केवल महिला को जल्दी सोने की सलाह देने से नहीं निकलेगा। घर और कार्यस्थल दोनों जगह ऐसी परिस्थितियां बनानी होंगी, जहां उसे पर्याप्त आराम मिल सके।
नींद की जरूरत को समझना व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय होने के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी का मुद्दा भी है। पर्याप्त नींद मिलने पर शरीर को आराम, मस्तिष्क को पुनर्बहाली और व्यक्ति को अगले दिन की गतिविधियों के लिए ऊर्जा मिलती है। इसलिए महिलाओं की नींद को उनकी उत्पादकता के रास्ते में बाधा नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की बुनियादी जरूरत के रूप में देखना जरूरी है।
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