मुंबई, 9 अगस्त : फरहान अख्तर की बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘दिल चाहता है’ हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने दोस्ती और युवाओं की जिंदगी को पर्दे पर दिखाने का नजरिया बदल दिया। 2001 में रिलीज हुई इस फिल्म ने तीन दोस्तों की कहानी को केंद्र में रखा और उस दौर के पारंपरिक रोमांटिक फॉर्मूले से अलग रास्ता चुना।
फिल्म के 25 साल पूरे होने के मौके पर फरहान अख्तर ने इसकी कास्टिंग और निर्माण से जुड़े कई दिलचस्प किस्से साझा किए हैं। द जगरनॉट के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि फिल्म के लिए कलाकारों को तैयार करना उनके सामने शुरुआती बड़ी चुनौतियों में से एक था। खास तौर पर आमिर खान को फिल्म में शामिल करने के लिए उन्हें करीब आठ महीने तक इंतजार करना पड़ा।
हर कोई लव ट्रायंगल करना चाहता था’
फरहान अख्तर के मुताबिक, उस दौर में मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में प्रेम कहानी और लव ट्रायंगल काफी आम थे। ऐसे समय में तीन दोस्तों की ऐसी कहानी बनाना, जिसमें दोस्ती को किसी प्रेम प्रतिद्वंद्विता के बजाय कहानी का केंद्र बनाया गया हो, एक अलग विचार था।
फरहान ने बताया कि कलाकारों के बीच भी उस समय मल्टी-हीरो फिल्म को लेकर हिचकिचाहट थी। उनके अनुसार, कई कलाकारों का मानना था कि वे ऐसी फिल्म नहीं करना चाहते, जिसमें कई प्रमुख कलाकार हों। इसी संदर्भ में उन्होंने आमिर खान की कास्टिंग को याद करते हुए कहा कि उस समय हर कोई लव ट्रायंगल वाली कहानी करना चाहता था। फरहान के लिए हालांकि ‘दिल चाहता है’ का मूल विचार शुरू से ही दोस्ती था।
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दो दोस्तों को एक लड़की के लिए लड़ते नहीं दिखाना चाहते थे
फरहान अख्तर ने साफ किया कि वह कहानी में दोस्ती के बीच किसी लड़की को लेकर संघर्ष का पुराना फॉर्मूला नहीं जोड़ना चाहते थे। उनका उद्देश्य तीन दोस्तों की जिंदगी, उनके रिश्तों और आपसी जुड़ाव को कहानी का मुख्य आधार बनाना था। उनके अनुसार, फिल्म की कहानी का मूल दोस्ती थी और वह दो दोस्तों को एक लड़की के लिए आपस में लड़ते हुए दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखते थे। यही सोच आगे चलकर फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बनी।
आमिर खान को मनाने में लगे आठ महीने
आमिर खान को ‘दिल चाहता है’ में शामिल करना फरहान अख्तर के लिए आसान नहीं रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने लगातार कोशिश की, लेकिन आमिर खान ने तुरंत पूरी स्क्रिप्ट सुनने के लिए हामी नहीं भरी। फरहान के मुताबिक, करीब आठ महीने तक इंतजार करने के बाद आमिर खान पूरी कहानी सुनने के लिए तैयार हुए। यह इंतजार इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि फरहान इस भूमिका के लिए आमिर को ही अपनी पसंद मानकर चल रहे थे।
इस दौरान फरहान ने अपने पिता और मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के माध्यम से किसी विशेष परिचय या सिफारिश का सहारा लेने के बजाय खुद प्रयास जारी रखा। जावेद अख्तर और आमिर खान इससे पहले ‘लगान’ जैसी चर्चित फिल्म से जुड़े हुए थे, लेकिन फरहान ने इस पेशेवर रिश्ते को अपनी कास्टिंग प्रक्रिया का आधार नहीं बनाया।
आमिर को भी समझ आया फरहान का भरोसा
फरहान ने बताया कि जब आखिरकार आमिर खान ने फिल्म के लिए हामी भरी, तो उन्होंने बाद में यह बात कही कि उन्हें खुशी है कि फरहान ने उन्हें लेने के लिए इतनी मेहनत की। आमिर के लिए फरहान का लगातार प्रयास इस बात का संकेत था कि निर्देशक को उनके अंदर इस भूमिका के लिए जरूरी चीजें दिखाई दे रही थीं। इस तरह लंबी कास्टिंग प्रक्रिया आखिरकार फिल्म के लिए एक महत्वपूर्ण फैसले में बदल गई।
2001 में रिलीज हुई थी ‘दिल चाहता है’
‘दिल चाहता है’ साल 2001 में रिलीज हुई थी। फिल्म में आमिर खान, सैफ अली खान और अक्षय खन्ना ने तीन दोस्तों की मुख्य भूमिकाएं निभाईं। प्रीति जिंटा, डिंपल कपाड़िया, सोनाली कुलकर्णी और आयशा टाकिया सहित कई कलाकार भी फिल्म का हिस्सा थे।
फिल्म ने युवाओं की दोस्ती, रिश्तों, करियर और जीवन में आने वाले बदलावों को अपेक्षाकृत आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया। इसकी कहानी में तीनों दोस्तों की जिंदगी अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ती है, लेकिन उनका रिश्ता कहानी का भावनात्मक आधार बना रहता है।
फिल्म ने दोस्ती वाली कहानियों को दी नई पहचान
‘दिल चाहता है’ की सफलता का असर केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहा। फिल्म ने हिंदी सिनेमा में दोस्ती पर आधारित कहानियों को एक नई पहचान दी। इसके संवाद, किरदार, संगीत और दृश्य शैली लंबे समय तक दर्शकों के बीच चर्चा में रहे। फिल्म के 25 साल पूरे होने के मौके पर फरहान अख्तर की कास्टिंग से जुड़ी यादें यह भी दिखाती हैं कि फिल्म का अलग विचार उस समय कितनी बड़ी चुनौती था। जहां पारंपरिक रोमांटिक फॉर्मूला ज्यादा प्रचलित था, वहीं फरहान ने दोस्ती को कहानी का केंद्र बनाकर एक अलग रास्ता चुना।
आज ‘दिल चाहता है’ को हिंदी सिनेमा की प्रभावशाली फिल्मों में गिना जाता है। फरहान अख्तर के हालिया खुलासे से यह साफ होता है कि पर्दे पर सहज नजर आने वाली इस दोस्ती की कहानी को दर्शकों तक पहुंचाने से पहले पर्दे के पीछे कई महत्वपूर्ण फैसले लेने पड़े थे।
