नई दिल्ली, 17 सितंबर : अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले एक विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है, जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन को ऐसे बड़े खरीदारों के रूप में चर्चा में शामिल किया गया है, जिन पर इस प्रावधान का असर पड़ सकता है।
हालांकि, विधेयक के पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत से आने वाले सामान पर तुरंत 100 फीसदी टैरिफ लागू हो गया है। प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति को परिस्थितियों के आधार पर ऐसे देशों के खिलाफ सेकेंडरी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। अब विधेयक आगे की प्रक्रिया के लिए व्हाइट हाउस जाएगा।
हाउस में 262-159 से पास हुआ विधेयक
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक को 262-159 के अंतर से मंजूरी मिली। मतदान के दौरान कई डेमोक्रेट सांसद भी ज्यादातर रिपब्लिकन सांसदों के साथ दिखाई दिए। विधेयक का मुख्य उद्देश्य यूक्रेन में जारी युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना बताया गया है।
प्रस्ताव में रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों को निशाना बनाने के साथ-साथ उसके तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। शैडो फ्लीट के तहत उन टैंकरों का उल्लेख किया गया है, जिन पर रूस को मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
विधेयक में ईरान के खिलाफ अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रावधान शामिल है। रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए ऊर्जा व्यापार को इस प्रस्ताव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
भारत और चीन पर क्यों पड़ सकता है असर
भारत के लिए इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों के खिलाफ संभावित सेकेंडरी टैरिफ का प्रावधान है। विधेयक के तहत राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से तेल और गैस की खरीद जारी रखते हैं।
हाउस में हुई बहस के दौरान भारत और चीन का विशेष रूप से उन देशों के तौर पर उल्लेख किया गया, जो रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार हैं। ऐसे में विधेयक के लागू होने की स्थिति में दोनों देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर इसका असर पड़ने की संभावना का मुद्दा सामने आया है।
फिर भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बिल पास होने के साथ भारत पर स्वतः 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं हुआ है। टैरिफ लगाने का फैसला राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में होगा और इसके लिए कानून में दिए गए प्रावधानों के अनुसार आगे कार्रवाई करनी होगी।
अमेरिका-भारत व्यापार पर बढ़ सकती है अनिश्चितता
इस घटनाक्रम से अमेरिका और भारत के बीच व्यापार तथा ऊर्जा संबंधों को लेकर अनिश्चितता का एक नया पहलू सामने आया है। यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा व्यापार में बदलाव आया और भारत रूसी कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार बना रहा है।
अमेरिकी पक्ष की ओर से पहले भी भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने को लेकर आपत्ति जताई जाती रही है। ट्रंप और उनके समर्थकों का कहना रहा है कि रूसी तेल की खरीद से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए आर्थिक समर्थन मिलता है।
नए विधेयक में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ संभावित टैरिफ को आर्थिक दबाव के एक साधन के तौर पर रखा गया है। समर्थकों का तर्क है कि ऐसे टैरिफ का खतरा संबंधित देशों को रूस से ऊर्जा खरीद पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है।
भारत ने कहा- आर्थिक हितों की रक्षा करेंगे
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार देश के व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की प्राथमिकताओं में शामिल है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने और बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की कोशिश जारी रखेगा।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिका के अलग-अलग अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अमेरिका को इस कानून के संभावित प्रभावों और दोनों देशों के संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले असर के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। इसके साथ ही सरकार इस अमेरिकी कदम के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी।
अब व्हाइट हाउस के फैसले पर नजर
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति के विचार के लिए व्हाइट हाउस जाएगा। यदि राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो कानून के तहत रूसी तेल और गैस के बड़े खरीदार देशों पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने का अधिकार उपलब्ध होगा।
इसका अगला असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रपति इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करते हैं और किन देशों या वस्तुओं को संभावित टैरिफ के दायरे में लाया जाता है। इसलिए फिलहाल भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लागू होने की बात कहना सही नहीं होगा।
यह प्रस्ताव मूल रूप से अप्रैल 2025 में दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पेश किया था। बाद में उनके सम्मान में इसका नाम बदला गया। ट्रंप ने भी ग्राहम के निधन से पहले इस कानून को आगे बढ़ाने का समर्थन किया था।
अब भारत के लिए मुख्य चुनौती ऊर्जा जरूरतों, रूस के साथ ऊर्जा व्यापार और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन से जुड़ी है। आने वाले समय में अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले और कानून के तहत तय होने वाली कार्रवाई से स्थिति और स्पष्ट होगी।
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