मुंबई, 26 अक्टूबर : ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ की सफलता के बाद निर्देशक अभिषेक पाठक ने फिल्म की कहानी और इसे बनाने के अपने रचनात्मक फैसले को लेकर अहम जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी और आखिरी फिल्म के लिए वह मलयालम फिल्म का रीमेक करने के बजाय अपनी मौलिक कहानी पेश करना चाहते थे।
निर्देशक के मुताबिक, फिल्म की पटकथा तैयार करने में करीब दो साल का समय लगा। उनका उद्देश्य यह था कि फ्रेंचाइजी के अंतिम भाग को केवल पहले से मौजूद कहानी के आधार पर आगे न बढ़ाया जाए, बल्कि एक नई कहानी के जरिए विजय सालगांवकर की यात्रा को उसका अपना अंत दिया जाए।
दृश्यम 3 के लिए रीमेक से अलग रास्ता
अभिषेक पाठक का हिंदी ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी से जुड़ाव पहली फिल्म के निर्माता के तौर पर शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने ‘दृश्यम 2’ का निर्देशन किया। तीसरी फिल्म के समय उनके सामने मलयालम फिल्म की कहानी को रीमेक करने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने अलग रास्ता चुना।
अभिषेक पाठक ने बताया कि ‘दृश्यम 2’ के बाद उन्होंने तय किया कि अगली फिल्म के लिए अपनी कहानी लिखी जानी चाहिए, भले ही इसमें कितना भी समय लगे। इसी सोच के तहत पटकथा पर करीब दो साल तक काम किया गया और एक नई कहानी तैयार की गई।
उन्होंने कहा कि वह फिल्म को अपना बनाना चाहते थे। उनके अनुसार किसी फिल्म को उसके भीतर किए गए रचनात्मक काम को समझे बिना केवल ‘रीमेक’ का टैग दे देना उचित नहीं है। इसी संदर्भ में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा का उदाहरण भी दिया।
परिवार ही कहानी का केंद्र रहा
अभिषेक पाठक के लिए सबसे जरूरी बात यह थी कि कहानी में बदलाव करने के बावजूद ‘दृश्यम’ की मूल भावना बरकरार रहे। विजय सालगांवकर का किरदार अपने परिवार को बचाने के लिए लगातार परिस्थितियों का सामना करता है और कहानी का भावनात्मक केंद्र उसकी पत्नी और बेटियां हैं।
निर्देशक ने बताया कि लेखन के दौरान उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि रोमांच और भावनात्मक संघर्ष के बीच संतुलन बना रहे। उनके अनुसार यह एक साधारण आदमी की कहानी है, जो अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है।
इसी वजह से फिल्म में कहानी को अलग दिशा देने के बावजूद परिवार को केंद्र से हटाया नहीं गया। अभिषेक पाठक का मानना है कि फ्रेंचाइजी के अंतिम भाग में यही भावना प्रभावी तरीके से काम आई।
विजय के फैसलों के पीछे परिवार की वजह
फिल्म में यह विचार भी सामने आता है कि विजय बार-बार नियमों को अपने तरीके से मोड़ता है, लेकिन उसके फैसलों के पीछे अपने परिवार को बचाने की मजबूरी होती है।
अभिषेक पाठक ने फिल्म में सामने आने वाले ‘हीरो जेल नहीं जाता’ वाले विचार को भी विजय की परिस्थितियों से जोड़कर समझाया। उनके मुताबिक इसे हिंदी सिनेमा की परंपरा पर टिप्पणी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विजय अपनी कहानी खुद लिख रहा है और उसके जेल जाने का मतलब उसके परिवार का बर्बाद होना होगा। इसलिए वह ऐसा होने से रोकने के लिए हर संभव तरकीब अपनाता है।
अनुभवी कलाकारों के साथ काम का अनुभव
‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ में अजय देवगन, श्रिया सरन, जयदीप अहलावत और प्रकाश राज जैसे अनुभवी कलाकारों ने काम किया है। इन कलाकारों के साथ काम करने को लेकर अभिषेक पाठक ने कहा कि उनका काम कलाकारों को संभालने से ज्यादा यह सुनिश्चित करना था कि सभी एक ही लक्ष्य की दिशा में काम करें।
उन्होंने माना कि सभी कलाकार अपने साथ लंबा अनुभव लेकर आते हैं। निर्देशक के तौर पर उन्हें केवल यह स्पष्ट करना होता है कि फिल्म के जरिए क्या हासिल करना है। इसके बाद कलाकार अपनी भूमिका और अनुभव के आधार पर काम करते हैं।
निर्देशन और निर्माण की जिम्मेदारी अलग रखते हैं अभिषेक
अभिषेक पाठक ने अपने पिता कुमार मंगत पाठक के साथ निर्माता के तौर पर भी काम किया है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘ओमकारा’ और ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी फिल्मों में प्रोडक्शन इंटर्न के तौर पर की थी।
हालांकि, निर्देशक और निर्माता की दोनों भूमिकाएं एक साथ निभाने से वह बचने की कोशिश करते हैं। निर्देशक के रूप में उनका पूरा ध्यान रचनात्मक प्रक्रिया पर रहता है और वह निर्माता की भूमिका में तभी आते हैं, जब किसी फैसले के लिए इसकी जरूरत होती है।
करीब दो साल तक फिल्म के लेखन और निर्माण में व्यस्त रहने के बाद अभिषेक पाठक फिलहाल ब्रेक ले रहे हैं। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया है कि वह जल्द ही लेखन की दुनिया में लौटेंगे। उन्होंने बताया कि फिलहाल वह अलग-अलग जॉनर के साथ प्रयोग कर रहे हैं और अगले दो महीनों में अपने नए प्रोजेक्ट की घोषणा करेंगे।
‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ की सफलता
निर्देशक की इस फिल्म ने दुनियाभर में 560 करोड़ रुपये से ज्यादा का कलेक्शन किया है। फिल्म को हिंदी ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी और आखिरी कड़ी के रूप में पेश किया गया है।
फिल्म की व्यावसायिक सफलता से अभिषेक पाठक बेहद खुश और अभिभूत हैं। उनके लिए इस फिल्म की खास बात केवल इसका कारोबार नहीं, बल्कि फ्रेंचाइजी को अपनी मौलिक कहानी के जरिए एक अंतिम दिशा देना भी रहा।

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